shri kashi vishwanath Vishveshwar Jyotirlinga ki katha

shri kashi vishwanath Vishveshwar Jyotirlinga ki katha

विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का यह सातवां ज्योतिर्लिंग है जो उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित है शिव पुराण की कोठी रूद्र संहिता में इसकी स्थापना से जुड़ी कथा बताई गई है जिसके अनुसार एक बार भगवान् सदा शिव के मन में एक से दो हो जाने की इच्छा हुई फिर वह सगुण रूप में प्रकट हुए शिव कहलाए और वहीं पुरुष और स्त्री दो रूपों में प्रकट हो गये उनमें जो पुरुष था उसका नाम शिव हुआ और स्त्री शक्ति नाम से जानी जाती हैं.

shri kashi vishwanath Vishveshwar Jyotirlinga ki katha

शिव शक्ति अदृश्य रहकर प्रकृति और पुरुष की रचना की शिव जी ने कहा दोनों को तपस्या करनी चाहिए तपस्या से एक उत्तम सृष्टि का विस्तार होगा यह सुन प्रकृति और पुरुष बोले प्रभु तपस्या के लिए तो यहां कोई स्थान है ही नहीं फिर हम दोनों आपकी आज्ञा के अनुरूप कहां तपस्या करें तब सदा शिव ने उस लंबे चौड़े नगर का निर्माण किया जो उनका अपना ही स्वरूप था उस नगर का निर्माण करके उन्होंने उसे उन दोनों के लिए भेजा यह नगर आकाश में पुरुष के समीप आकर स्थित हो गया तब पुरुष श्री हरि ने उस नगर में स्थित हो सृष्टि की कामना से शिव का ध्यान करते हुए बहुत वर्षों तक तप किया उस समय परिश्रम के कारण उनके शरीर से श्वेत जल की अनेक धाराएं प्रकट हुई जिससे सारा शून्य आकाश ढक गया जिसकी वजह से कुछ भी दिखाई नहीं देने लगा उसे देखकर भगवान विष्णु ने कहा यह कैसी अद्भुत वस्तु दिखाई देती है आश्चर्य चकित हो कर उन्होंने अपना सिर हिलाया जिससे उनके एक कान में से एक मणि रत्न गिर गया जिस स्थान पर मणि गिरी वह मणिकर्णिका कहलाया .

जब स्वेत जल के कारण पंचकोशी डूबने और बहने लगी निर्गुण शिव जी ने उसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया उसके बाद विष्णु अपनी पत्नी के प्रकृति के साथ विश्राम करने लगे तब उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और उस कमल से उत्पन्न हुए ब्रह्मा जी भगवान शिव ने सोचा कि ब्रह्मांड के भीतर कर्म पास से बंधे हुए प्राणी मुझे कैसे प्राप्त कर सकेंगे यह सोचकर उन्होंने मुक्तिधाम मुक्ति दायनी पंचकोशी को इस जगत में छोड़ दिया और यहां स्वयं परमात्मा ने विमुक्त लिंग की स्थापना की भगवान शिव ने काशीपुरी को स्वयं अपने त्रिशूल से उतार कर मृत्युलोक में छोड़ दिया और ऐसा माना जाता है कि जब जब ब्रह्मा जी का एक 1 दिन पूरा होने पर जब सारे जगत में प्रलय हो जाता है तब इसका शिवपुरी का नाश नहीं होता उस समय भगवान स्वयं अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और जब ब्रह्मा द्वारा पुनह सृष्ठीका निर्माण करते हैं तब इसे फिर मृत्यु लोक पर स्थापित कर देते हैं कर्मों का कृष्ण करने से ही इस पूरी को काशी कहते हैं तभी से काशी में मुक्तेश्वर लिंग सदा विराजमान रहता है.

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