कृष्ण लीला गोवर्धन पर्वत की कथा – Krishna leela govardhan parvat kee katha

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 कृष्ण लीला गोवर्धन पर्वत की कथा – Krishna leela govardhan parvat kee katha

गोवरर्धन पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है. इससे पुर्व इंद्र की पुजा की जाती थी.लेकिन जब भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को तर्क दिया कि इंद्र से हमें कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है. वर्षा करना उनका कार्य है. वह सिर्फ अपना कार्य करते हैं. जबकि गोवर्धन पर्वत गो धन का संवर्धन व संरक्षण करता है जिससे पर्यावरण भी शुद्ध होता है इसलिए इंद्र की नहीं बल्कि गोवर्धन की पूजा हम सभी को करनी चाहिए. कृष्ण के इस प्रकार गोकुल वासियों को इंद्र की पूजा रुकवा कर गोवर्धन की पूजा करने पर इंद्रदेव काफी नाराज हो जाते हैं. इसके बाद इंद्र ने गोकुल वासियों पर भारी वर्षा करके उन्हें डराने का प्रयास किया जाता है. पानी घुटनों से ऊपर तक आने लगता है तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठाकर सभी गोकुल वासियों को इंद्र के कोप से बचा लिया जाता है.  इसके बाद से ही इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधि विधान शुरू हो गया और यह परंपरा आज कलयुग में भी निरंतर जारी है.

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 माना जाता है कि गोवर्धन की पूजा करने से श्री कृष्ण भगवान की कृपा मिलती है और हमें पर्यावरण को साफ सुथरा रखने का संदेश भी मिलता है. इस प्रकार श्री कृष्ण के द्वारा जब पर्वत उठा लिया जाता है तो सभी ब्रजवासी सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहते हैं. सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रज वासियों पर एक भी बूंद जल कि नहीं पड़ती है. जब ब्रह्मा जी ने इंद्र को बताया कि पृथ्वी पर श्री कृष्ण ने जन्म ले लिया है और उनसे उनसे तुम्हारा शत्रुता करना उचित नहीं है तो श्री कृष्ण अवतार की बात जानकर इंद्रदेव को अपनी मूर्खता का एहसास होता है वह बहुत लज्जित होते हैं. धरती पर आकर श्री हरि विष्णु अवतारी श्री कृष्ण भगवान  से झमा याचना करते हैं. कृष्ण के द्वारा जब गोवर्धन को सातवें दिन नीचे रखा जाता है तो सभी गोकुल वासियों को कहा जाता है कि अब प्रति वर्ष केवल गोवर्धन की पूजा की जाएगी और अन्नकूट पर्व का उत्साह के साथ अंकूट पर्व मनाया जाएगा.  

श्री कृष्ण के द्वारा दिए गए इस संदेश के पालना में हम सभी निरंतर अन्नकूट महोत्सव को मनाते हैं गोवर्धन पूजा को करते हैं जिससे हमें श्री कृष्ण भगवान की माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है. हमारा देश पारंपरिक परंपराओं का देश है कुछ लोग इन सभी बातों को अंधविश्वास कहते हैं अंधविश्वास मानते हैं जबकि ऐसा नहीं है यदि ऐसा होता तो यह परंपराएं कभी कि समाप्त हो चुकी होती है. भारत की भूमि देवताओं की भूमि है, ऋषि और मुनियों की भूमि है तो यह सारी चीजें अंधविश्वास नहीं है बल्कि हमारे देश की हमारी परंपराओं की हमारी संस्कृति की जान है जिन्हें जिंदा रखना हम सभी की जिम्मेदारी है हमारा कर्तव्य है तो आप इन परंपराओं को जिंदा रखिए और उस ईश्वर में विश्वास रखिए.

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